हर साल ₹1.22 लाख करोड़ का खाना बर्बाद हो रहा:सिर्फ 4% फल-सब्जियों को कोल्ड-स्टोरेज मिल रहा, 8.20% पहुंच सकती है खाद्य महंगाई
भारत में हर साल लगभग 1.22 लाख करोड़ रुपए का खाना लोगों की थाली तक पहुंचने से पहले खराब हो जाता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके 2 कारण हैं- एक फल-सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड-स्टोरेज की कमी और दूसरा मौसम का बदलाव व बढ़ती गर्मी। देश के कुल ताजे उत्पादन में से सिर्फ 4% सामान
भारत में हर साल लगभग 1.22 लाख करोड़ रुपए का खाना लोगों की थाली तक पहुंचने से पहले खराब हो जाता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके 2 कारण हैं- एक फल-सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड-स्टोरेज की कमी और दूसरा मौसम का बदलाव व बढ़ती गर्मी। देश के कुल ताजे उत्पादन में से सिर्फ 4% सामान को ही कोल्ड-स्टोरेज में रखने की सुविधा मिल पाती है। खाना बर्बाद होने से बाजार में चीजें कम पड़ती हैं, जिसका सीधा असर आम लोगों के बजट और खाद्य महंगाई पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 30 से 40% फल-सब्जियां बाजार या ग्राहकों तक पहुंचने से पहले ही सड़ जाती हैं। वहीं, सही रखरखाव और ट्रांसपोर्ट की कमी के कारण 5 से 6% अनाज भी रास्ते में ही खराब हो जाता है। इससे खाद्य महंगाई 8.20% तक पहुंच सकती है। खाद्य महंगाई बढ़कर 8.20% होने का अनुमान अनाज और सब्जियों की बर्बादी ऐसे समय में हो रही है, जब देश में आम जनता पर महंगाई की मार बढ़ती जा रही है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अक्टूबर में रीटेल महंगाई दर बढ़कर 5.93% पहुंच सकती है, जो सितंबर में 5.54% थी। सबसे ज्यादा असर रसोई के बजट पर पड़ रहा है। आम आदमी के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा खाने-पीने की चीजों पर ही होता है और खाद्य महंगाई सितंबर के 7.74% से बढ़कर अक्टूबर में 8.20% हो सकती है। कम बारिश से सब्जियों और फसलों की आवक घटी है, वहीं विदेशी बाजारों से आने वाला खाद्य तेल भी महंगा हुआ है। 2026 की शुरुआत से प्याज के दाम लगभग 108% तक बढ़ चुके हैं, जबकि दूध, मीट और अंडे की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। फसल सड़ने से बिगड़ रहा है घर का बजट गर्मी और खराब मौसम की वजह से फल-सब्जियां जल्दी सड़ जाती हैं। रिपोर्ट में दिल्ली की आजादपुर मंडी के एक फल व्यापारी का उदाहरण दिया गया, जिसे साल 2024 में गर्मी से आम सड़ने के कारण एक ही दिन में 1 लाख रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ था। देश की 2 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा (14%) खेती की जमीन खराब मौसम से प्रभावित है और 45% हिस्से पर बाढ़ का खतरा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौसम की मार का असर अब सिर्फ खेतों तक नहीं, बल्कि बाजारों में बढ़ते दामों और आम आदमी की रसोई के बजट पर भी साफ पड़ रहा है। RBI बढ़ा सकता है ब्याज दरें खाने-पीने की चीजों के लगातार महंगे होने से भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता बढ़ गई है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई के अनुमान को बढ़ाकर 5.2% कर दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक दिसंबर में होने वाली बैठक में रेपो रेट को 0.25% (25 बेसिस पॉइंट्स) और बढ़ा सकता है, जिससे होम लोन और कार लोन की किश्तें महंगी हो सकती हैं। फसल की बर्बादी किसान का नुकसान नहीं, पूरे सिस्टम की खराबी क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च प्रमुख डॉ. पलक बालियान का कहना है कि भारत में अनाज और फल-सब्जियों का खराब होना सिर्फ खेती की समस्या नहीं, बल्कि यह पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन की विफलता है। एक-तिहाई फल और सब्जियां तो ग्राहकों तक पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाती हैं। ऊपर से गर्मी और बिन मौसम बारिश जैसी मौसम की मार इस नुकसान को और ज्यादा बढ़ा देती है। डेयरी किसानों को हर साल हजारों करोड़ का नुकसान गर्मी का बुरा असर अब देश के दूध कारोबार पर भी पड़ रहा है। लगातार बढ़ते तापमान से मवेशियों (गायों-भैंसों) को होने वाली परेशानी के कारण हर साल भारत में लगभग 18 लाख टन दूध का उत्पादन कम हो जाता है। इससे देश को हर साल करीब 2,661 करोड़ रुपए का नुकसान झेलना पड़ रहा है। देश के करीब 40% मवेशी खराब मौसम की मार से सीधे प्रभावित हैं। इसका सीधा असर डेयरी किसानों की कमाई पर पड़ रहा है और बाजार में दूध की किल्लत का खतरा भी बढ़ रहा है। क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए कोल्ड स्टोरेज क्यों जरूरी? क्लाइमेट ट्रेंड्स का सुझाव है कि सरकार को तुरंत कोल्ड-स्टोरेज और कोल्ड-चेन नेटवर्क बढ़ाना चाहिए, ताकि फल-सब्जियां सड़ने से बच सकें। इसके अलावा मौसम की सटीक जानकारी देने वाले वार्निंग सिस्टम, किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने और ऐसी खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है, जो मौसम की मार झेल सके। रिसर्च प्रमुख डॉ. पलक बालियान के अनुसार, सिर्फ मौसम का हाल बता देने से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए अनाज और सब्जियों को सुरक्षित रखने वाले स्टोरेज, आधुनिक तकनीकों और सीधे बाजार तक पहुंच में बड़ा निवेश करना होगा, ताकि मौसम की मार से होने वाला सारा घाटा अकेले किसान को न झेलना पड़े।