पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये के बीच NATO जैसा रक्षा समझौता:एक पर हमला तीनों पर माना जाएगा; दुश्मनों से मिलकर निपटने का प्लान
'एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।' इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने शुक्रवार को 'मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट' पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता सिर्फ रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि तीनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक गठजोड़ को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश माना जा रहा है। समझौते के तह
'एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।' इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने शुक्रवार को 'मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट' पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता सिर्फ रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि तीनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक गठजोड़ को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश माना जा रहा है। समझौते के तहत तीनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास करेंगे, खुफिया जानकारी साझा करेंगे, सुरक्षा तालमेल बढ़ाएंगे और क्षेत्रीय चुनौतियों से मिलकर निपटने की रणनीति बनाएंगे। पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये की सैन्य ताकत साथ आई इस समझौते में तीनों देशों की अलग-अलग सैन्य ताकत साथ जुड़ती है। सहयोगी देशों का अमेरिका पर भरोसा डगमगाया दशकों तक अमेरिका पर सुरक्षा के लिए भरोसा करने वाले पश्चिम एशिया के कई देश अब नए विकल्प तलाश रहे हैं। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ यह रक्षा समझौता भी उसी बदलते माहौल का हिस्सा माना जा रहा है। अल जजीरा के मुताबिक, सऊदी अरब और कुछ हद तक तुर्किये लंबे समय से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प ने साफ कह दिया है कि अब उसके सहयोगी देशों को अपनी सुरक्षा का बोझ खुद उठाना होगा। इस बदले रुख ने सहयोगी देशों को अपने सुरक्षा समीकरण नए सिरे से बनाने पर मजबूर कर दिया है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट के कई देशों का मानना है कि अमेरिका की क्षेत्रीय नीति में इजराइल को सबसे ज्यादा प्राथमिकता मिलती है। ऐसे में सऊदी अरब समेत कई देश अब सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपने क्षेत्रीय रक्षा गठजोड़ मजबूत करने की रणनीति अपना रहे हैं। अलग-अलग मोर्चों पर जूझ रहे तीनों देश यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब मिडिल ईस्ट में इजराइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। पाकिस्तान फरवरी से अफगानिस्तान के साथ सीमा पर संघर्ष में उलझा है। मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच भी कई दिनों तक सैन्य तनाव और फायरिंग हुई थी। वहीं, सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हमलों की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। दूसरी ओर, तुर्किये लंबे समय से देश के भीतर और सीमा पार सक्रिय कुर्द हथियारबंद गुटों से लड़ रहा है। इजराइल के साथ भी उसके रिश्तों में तनाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में तीनों देशों ने अपनी सैन्य क्षमताओं और सहयोग को मजबूत करने के लिए यह कदम उठाया है, ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का मिलकर सामना किया जा सके। समझौते में सैन्य मदद कितनी जरूरी होगी? अल जजीरा के मुताबिक, मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट का मकसद तीनों देशों को साझा सुरक्षा ढांचा देना और किसी भी बाहरी खतरे का मिलकर सामना करना है। हालांकि, इसकी असली ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि संकट की स्थिति में सदस्य देश एक-दूसरे की मदद के लिए कितनी दूर तक जाने को तैयार होंगे। किलोवेन ग्रुप एडवाइजरी फर्म के चेयरमैन हार्लन उलमैन ने अल जजीरा से कहा कि माना जा रहा है कि इस समझौते में एक देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जा सकता है। लेकिन उन्होंने कहा कि 'ऐसा होना चाहिए' और ‘ऐसा होना तय है’- इन दोनों बातों में बड़ा अंतर है। उनके मुताबिक, फिलहाल यह साफ नहीं है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो क्या बाकी दो देशों के लिए उसकी तरफ से युद्ध में उतरना जरूरी होगा। यानी अगर ईरान, पाकिस्तान या तुर्किये में से किसी एक पर हमला होता है, तो क्या दूसरे देश अपनी सेना भेजेंगे या सिर्फ राजनीतिक, खुफिया या हथियारों जैसी मदद देंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। क्या मुस्लिम देशों का नया NATO बन रहा है? पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के इस समझौते को कई जानकार 'मुस्लिम नाटो' की दिशा में एक अहम कदम मान रहे हैं। इसकी वजह यह है कि यह समझौता NATO की तरह सदस्य देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात करता है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर तीनों देश एक-दूसरे की सैन्य मदद करेंगे, आधुनिक हथियारों की संयुक्त खरीद करेंगे, रक्षा तकनीक साझा करेंगे और सुरक्षा से जुड़े मामलों में मिलकर काम करेंगे। हालांकि, यह गठबंधन NATO जैसा मजबूत बन पाएगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अभी इसमें सिर्फ तीन देश शामिल हैं। अगर भविष्य में मिस्र, कतर, सीरिया और UAE जैसे दूसरे मुस्लिम देश भी इससे जुड़ते हैं, तभी यह व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन का रूप ले सकता है। अल जजीरा के मुताबिक, मिडिल ईस्ट के सुन्नी बहुल देश लंबे समय से अलग-अलग गुटों में बंटे रहे हैं। जानकारों का मानना है कि इसी वजह से वे इजराइल और ईरान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों पर एकजुट होकर काम नहीं कर पाए।