ट्रांसजेंडर एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस:सर्जरी से महिला बने व्यक्ति को महिला अधिकार देने पर सवाल; केंद्र ने 7 साल पहले कानून बनाया था
क्या बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष जन्मा व्यक्ति, सर्जरी करवाने के बाद महिला के लिए आरक्षित अधिकारों का दावा कर सकता है… इस सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने बायोलॉजिक मेल को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला दर्ज करने की व्यवस
क्या बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष जन्मा व्यक्ति, सर्जरी करवाने के बाद महिला के लिए आरक्षित अधिकारों का दावा कर सकता है… इस सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने बायोलॉजिक मेल को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला दर्ज करने की व्यवस्था को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता संगठन 'विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया' ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7और नियम 7 को चुनौती दी है। याचिका के मुताबिक, यह प्रावधान बायोलॉजिकल पुरुषों को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में खुद को 'महिला' के तौर पर दर्ज कराने की अनुमति देता है। याचिका में 2014 के NALSA जजमेंट पर भी पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसमें ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी जेंडर पहचान की कानूनी मान्यता का अधिकार दिया गया था। 28 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान बेंच ने बताया - जन्म से पुरुष लेकिन महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांस व्यक्ति को बायोलॉजिकल महिला के समान दर्जा नहीं मिलना चाहिए। याचिकाकर्ता बोले- सर्जरी से जैविक क्रोमोसोम-जेनेटिक्स नहीं बदलते याचिकाकर्ता संगठन के मुताबिक, जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। मौजूदा व्यवस्था जेंडर आइडेंटिटी को जैविक सेक्स का आधार मानती है। इससे जन्म के समय पुरुष दर्ज व्यक्ति सरकारी दस्तावेजों में महिला पहचान हासिल कर सकते हैं। याचिका में दावा है कि इससे जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी संरक्षण तथा लाभ प्रभावित होते हैं। याचिका में कहा गया, “कोई भी मेडिकल या सर्जिकल प्रक्रिया, चाहे वह कितनी भी व्यापक हो, व्यक्ति के जैविक सेक्स, क्रोमोसोम या जेनेटिक्स को नहीं बदलती।” सुनवाई में क्या हुआ याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित सिबल पेश हुए। उन्होंने कहा कि यह याचिका खासतौर पर जैविक महिलाओं के अधिकारों की बात करती है। सिबल ने कहा कि ये लाभ बने रहने चाहिए और इनमें दखल नहीं होना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुख्य याचिकाओं के समूह में जवाब तैयार किया जा रहा है। इस याचिका का जवाब भी उसी में शामिल किया जाएगा। इस स्थिति में उनका तर्क होगा कि मामला विधायिका पर छोड़ा जा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा, विधायिका ने इस मुद्दे पर फैसला नहीं किया है। ट्रांस व्यक्ति बच्चे को जन्म नहीं दे सकता, लेकिन जैविक महिला बच्चे को जन्म दे सकती है। जस्टिस मोहना ने कहा कि ट्रांसजेंडर बच्चे को जन्म दे सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांसजेंडर बच्चे को जन्म नहीं दे सकते। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि खुद को पुरुष या महिला मानना असली समस्या है। उन्होंने कहा कि जैविक पुरुष, जिसके शरीर में पुरुषों जैसी सभी शारीरिक विशेषताएं हैं, खुद को महिला बताकर खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अधिकार मांग सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ अदालतों ने ऐसे मामलों में आदेश दिए हैं। इसके बाद जैविक पुरुष महिला खिलाड़ियों के साथ खेल सकता है और उसकी शारीरिक ताकत का असर पड़ सकता है। याचिका में 3 फैसलों का हवाला दिया याचिकाकर्ता ने महिला आरक्षण, सेक्स-विशेष पदों पर भर्ती, खेलों में भागीदारी और अलग-अलग जेंडर के लिए बने स्थानों के इस्तेमाल से जुड़े कई फैसलों और प्रशासनिक कदमों का हवाला दिया है। याचिका में संविधान के 5 अनुच्छेदों पर तर्क 1. अनुच्छेद 14 - समानता का अधिकारकानून सबके लिए बराबर होना चाहिए, और बराबर लोगों में भेद नहीं होना चाहिए। याचिका का तर्क: बायोलॉजिकल महिला और बायोलॉजिकल पुरुष की शारीरिक संरचना, प्रजनन क्षमता, क्रोमोसोम अलग हैं। ये दो अलग-अलग वर्ग हैं। इन्हें एक ही वर्ग मानकर महिला के लिए बनी योजनाओं में ट्रांस महिला को शामिल करना Article 14 के खिलाफ है, क्योंकि असमान लोगों को समान मानना भी असमानता है। 2. अनुच्छेद 15(3) - महिलाओं के लिए विशेष प्रावधानराज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कानून बनाने की छूट देता है। इसी के तहत महिला आरक्षण, महिला थाने, महिला हॉस्टल, फ्री बस, बेटी बचाओ जैसी योजनाएं बनीं। याचिका का तर्क: 15(3) में 'महिला' शब्द का मतलब संविधान बनाते समय बायोलॉजिकल महिला था, जो ऐतिहासिक तौर पर शोषण और शारीरिक कमजोरी के कारण सुरक्षा की हकदार थी। अगर बायोलॉजिकल पुरुष को दस्तावेज बदलकर इस श्रेणी में डाल दिया गया, तो जिस वर्ग के लिए विशेष सुरक्षा बनाई गई थी, उसका लाभ ही खत्म हो जाएगा। 3. अनुच्छेद 16 - नौकरी में समान अवसरसरकारी नौकरियों में बराबर मौका। याचिका का तर्क: महिला नर्सिंग असिस्टेंट, महिला पुलिस कांस्टेबल, महिला टीचर जैसे पद खास तौर पर महिलाओं की प्राइवेसी और जरूरतों को देखते हुए बनाए गए हैं। मद्रास हाईकोर्ट के केस का उदाहरण जहां पुरुष नर्सिंग असिस्टेंट को महिला नर्सिंग असिस्टेंट बना दिया गया, उसमें महिला मरीजों की प्राइवेसी, गरिमा पर असर पड़ता है। 4. अनुच्छेद 19(1)(a) - अभिव्यक्ति की आजादी याचिका का दोहरा तर्क: एक तरफ वह कहती है कि वह किसी की जेंडर पहचान रखने की अभिव्यक्ति का विरोध नहीं करती, लेकिन दूसरी तरफ बायोलॉजिकल महिलाओं की अभिव्यक्ति भी है - वे यह कह सकें कि महिला कौन है, इसे परिभाषित करने का हक उन्हें है। अगर कानून जेंडर आइडेंटिटी को ही सेक्स मान ले, तो बायोलॉजिकल महिला अपनी अलग पहचान और अनुभवों पर बात नहीं कर पाएगी। 5. अनुच्छेद 21 - जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमाइसमें प्राइवेसी, गरिमा, शारीरिक सुरक्षा शामिल है। याचिका के मुताबिक: महिला हॉस्टल, जेल, वॉशरूम, चेंजिंग रूम, हॉस्पिटल वार्ड - ये सेक्स-सेग्रीगेटेड जगहें Article 21 के तहत महिलाओं की प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए हैं। अगर इनमें बायोलॉजिकल पुरुष को महिला दस्तावेज के आधार पर प्रवेश दिया गया, तो महिलाओं के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार पर असर पड़ेगा। 2011 की जनसंख्या में 4.87 लाख ट्रांस पर्सन भारत में जन्म के समय पुरुष दर्ज हुए और सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला दर्ज कराने वाले लोगों की सटीक संख्या का सार्वजनिक सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, इससे जुड़े कुछ आंकड़े जरूर मोजूद 2011 की जनगणना में ‘अन्य’ जेंडर कैटेगरी में दर्ज थे। इसमें सिर्फ ट्रांसजेंडर व्यक्ति नहीं, बल्कि ‘अन्य’ पहचान दर्ज कराने वाले लोग भी शामिल थे। इनकी कुल संख्या 4.87 लाख है। ------------------------- ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट का ट्रांसजेंडर संशोधन एक्ट पर केंद्र-राज्यों को नोटिस: सिंघवी बोले- संशोधन पहचान खुद तय करने का अधिकार छीनता है सुप्रीम कोर्ट ने करीब 6 महीने पहले भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने संशोधन पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से 'सेल्फ आइडेंटिफिकेशन' (अपनी पहचान खुद तय करने) का अधिकार छीनता है। पढ़ें पूरी खबर…